चंबा 14 जनवरी 2026: देशभर में लोहड़ी का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन मकर संक्रांति से एक दिन पूर्व चंबा में मनाई जाने वाली लोहड़ी अपनी ऐतिहासिक और अनोखी परंपरा के लिए विशेष पहचान रखती है। सदियों पुरानी इस परंपरा की जड़ें चंबा रियासत की स्थापना से जुड़ी हैं और देश भर में ये एक अनोखी लोहड़ी है। इतिहासकारों के अनुसार दसवीं शताब्दी में राजा साहिल वर्मन द्वारा चंबा रियासत की स्थापना के समय नगर को नकारात्मक शक्तियों से मुक्त रखने के लिए विभिन्न मोहल्लों में मढ़ियों की स्थापना करवाई गई। एक माह तक इन मढ़ियों में अलाव जलाए जाते थे और अंतिम दिन भगवान शिव के प्रतीक स्वरूप राज मढ़ी से त्रिशूलनुमा मशाल राज मुशहरा निकाला जाता है।
परंपरा की शुरुआत करते हुए कल रात भी सुराड़ा मोहल्ला स्थित शिव मंदिर में विधिवत पूजा के बाद राज मुशहरा निकला। वहीं चौंतड़ा मोहल्ले से बजीर मुशहरा निकला। रात ग्यारह बजे दोनों मुशहरों का एक स्थान पर मिलन हुआ जिसके बाद राज मुशहरा पूरे शहर की मढ़ियों में डुबोया जाता है। इसे नगर की सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। चम्बा के बुद्धिजीवी वर्ग जसबीर नागपाल और किशोर शर्मा ने सभी को मकर संक्रांति और लोहड़ी पर्व की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि लगभग 450 वर्ष पुरानी इस परंपरा को आज भी चम्बा में निभाया जा रहा है। समाज के सभी वर्गों की इसमें सहभागिता रहती है। पहले इसमें पशु बलि की प्रथा थी, जिसे अब नारियल फोड़कर निभाया जाता है। आज भी चंबा की लोहड़ी आस्था, इतिहास और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक बनी हुई है। उनके अनुसार पूर्व समय में चम्बा में बुरी आत्माओं का काफी प्रभाव था जिनकी शांति के लिए मशाल यात्रा निकाली गई और इस प्राचीन स्वरूप में लोहड़ी का ये पर्व आज भी धूमधाम के साथ मनाया जाता है।

